"भीड़ के इन जंगलों में आदमी हैरान है,न जाने किस गुफा में खो गई पहचान है।
जिंदगी का दर्द जीने के लिए दम चाहिए,लाश कँधे पर उठाना बहुत आसान है।"
उक्त पंक्तियों के अर्थ पर यदि हम दृष्टि डालें तो इससे केवल एक ही अर्थ निकलता है- दूसरों के प्रति दिखाई जाने वाली सहानुभूति, प्रेम व दया । आज के इस परिवर्तनशील युग में सभी अपने-2 स्वार्थ में डूबे हुए हैं, दूसरों के दुःख दर्द की किसी को कोई चिंता नहीं है । अगर सड़क पर कोई दुर्घटना हो जाए, तो लोग चलते रहते हैं उस पीड़ित को अस्पताल पहुँचाने तक की किसी को फ़ुर्सत नहीं है ।आज सरकार और जनता के बीच भी यही स्थिति है, जनता अपनी माँगों के लिए रोती रहती है और सरकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ता । राजनैतिक दुर्दशा व जन आक्रोश के कारण सर्वत्र त्राहि-2 मची हुई है । कहाँ गया वो सम्मान ? कहाँ गई सोने की चिड़िया की गरिमा ? ऐसा क्या है, जो हमारे देश को खोखला किए जा रहा है ? स्वतंत्रता के इन 63 वर्षों में यदि हम देखें तो लगभग सभी परिस्थितियों में एक ही उत्तर मिलता है- आँदोलन...जनता का आँदोलन ।
आँदोलन तो आज़ादी से पूर्व भी होते थे, परंतु वे अहिंसात्मक होते थे, आज की भाँति हिंसात्मक नहीं । आज के युग में आँदोलन के अहिंसात्मक से हिंसात्मक में परिवर्तित होने के लिए ज़िम्मेदार न सिर्फ जनता को ठहराया जा सकता है, अपितु ऐसा करने पर सरकार ही हमें मजबूर करती है ।आज हमारी एक आदत सी बन चुकी है कि हम अपनी बात को शांतिपूर्ण तरीके से कहना ही भूल गए हैं, बस सीधे आँदोलन पर ही उतर आते हैं, क्योंकि हमें पता है कि बिना आँदोलन के सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
इस बात को कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि आज स्थिति पूर्णतः बदल गई है । जन आँदोलन से तात्पर्य है-जनता का आँदोलन । ये एक अलग बात है कि 1950 के बाद संवैधानिक रूप से हमें अपनी माँगों की पूर्ति के लिए जन आँदोलन करने का अधिकार मिला है । परन्तु जनता कुछ ऐसी माँगों के लिए आँदोलन प्रारंभ कर देती है जिनकी पूर्ति करना शायद सरकार के लिए असंभव होता है । कभी वह सोचता है कि हम आँदोलन के माध्यम से जातिविशेष आरक्षण प्राप्त कर लें, कभी अलग राज्य की माँग, तो कभी देवी-देवताओं के मंदिरों को लेकर आँदोलन, देश में आर्थिक उन्नति हेतु कोई साधन जुटाने हो तो भी लोग आँदोलन पर उतर आते हैं । ये सभी बातें इंगित करती हैं आँदोलन के बदलते स्वरूप को , जिससे स्वतः ही प्रकट हो जाती है- भारत की बदलती तस्वीर । देखा जाए तो आँदोलन का स्वरूप वाक़ई बदल गया है । इन 20-25 सालों में तो इसका विकराल रूप देखने को मिला ही है । आँदोलनों के जितने उदाहरण दिये जाए कम हैं ,परंतु कुछ ऐसे हैं जिनका विवरण नहीं दिया जाए तो बात अधूरी रह जाएगी ।
जैसा कि पूर्व में बताया जा चुका है कि आदमी जातिविशेष के लिए भी आँदोलन करता है । इस श्रृंखला में" गुर्जर आँदोलन" अछूता नहीं रह सकता । गुर्जरों ने हालाँकि पहले 2-3 सालों तक शांतिपूर्ण तरीके से आँदोलन करा परंतु जब सरकार की ढीली-ढाली नीति रही तो इन्हें अपने आँदोलन का स्वरूप बदलना पड़ा व इन्होनें मजबूरन सरकार के खिलाफ़ आवाज़ उठायी, इस आँदोलन में परिवहन बाधित किया गया, लोगों में तनाव रहा । वे मीणाओं से ईर्ष्या करने लगे । तब कहीं जाकर सरकार ने चिट्ठी केंद्र सरकार को भेजी । ये सभी कुछ आँदोलन का स्वरूप बदलने से ही संभव हो पाया है ,वरना स्थिति आज तक विपरीत ही रहती । अब चूँकि केंद्र सरकार इस मस़ले को लेकर वर्तमान में भी विचारमग्न है । वर्तमान कांग्रेस सरकार ने पिछले दिनों तथाकथित 5% आरक्षण में से 1% को तो लागू कर दिया है परंतु प्रश्न अभी भी ये हैं कि, क्या शेष 4% आरक्षण गुर्जरों के मार्फत केंद्र सरकार द्वारा प्रदत्त होगा ? क्या ये आरक्षण कांग्रेस ने मजबूरन गुर्जरों की पूर्वकथित हिंसात्मककारी गतिविधियों को देखते हुए दिया ? क्या 1% आरक्षण सरकार ने कुछ समय के लिए गुर्जरों का मुँह बँद रखने के लिए दिया है ? सवाल बहुत से हैं, परंतु स्थिति स्पष्ट है कि ये 1% आरक्षण भी गुर्जरों को सीधी उँगली से नहीं मिला । आगे क्या होगा...ये तो वक़्त ही बताएगा ।
आँदोलन के स्वरूप का ये तो एक पहलू है ऐसे अनेक आँदोलन और भी सामने आए हैं-अमरनाथ श्राइन बोर्ड विवाद जहाँ सरकार की भेदभावपूर्ण नीति के चलते जनता को आँदोलन का सहारा लेना ही पड़ा । नैनो के मसले को लेकर सिंगूर में जो त्राहीमाम् मचा था, वह किसी आँदोलन से कम न था ।
नक्सलवाद, यह पिछड़े आदिवासी जनजाति के लोगों द्वारा सीधे सरकार के विरूद्ध चलाया जा रहा है, इससे आम जनता भी प्रभावित होती है । वर्तमान में इसे आतंकवाद की संज्ञा दे दी गयी है । परंतु ये भी एक प्रकार का आँदोलन ही है, जी हाँ , ये लोग आतंकी गतिविधियों की आड़ लेकर अपनी माँगों की पूर्ति के लिए एक प्रकार का आँदोलन ही तो चला रहें हैं ।हालाँकि भारत के गृहमंत्री पी.चिदंबरम व माननीय प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने इस प्रकार के आतंकी गतिविधियों से जुड़े आँदोलनों को शीघ्रातिशीघ्र समाप्त करने का आश्वासन दे दिया है, परंतु अब केवल आश्वासन से ही कार्य नहीं बनेगा ।सरकार के साथ ही हम सभी को आँदोलन के इस भयावह रूप को बढ़ने से रोकना होगा ।
आज के युग में यदि आतंकवाद को समाप्त करने में भी यदि पुलिस प्रशासन व सरकार की ढीली-ढाली नीति रही तो जनता आँदोलन पर उतर सकती है ,फिर उसका खामियाज़ा सरकार के साथ-2 निर्दोष जनता को भी भुगतना पड़ेगा ।अतः इस बदलते आँदोलन के स्वरूप को रोकना ही होगा,नहीं तो हिंसात्मक आँदोलन रूपी वृक्ष अपनी जड़ें मज़बूत कर लेगा व भारत की शांतिपूर्ण और स्थिर जड़ों को हिलाकर रख देगा और सब यही कहते मिलेंगे कि...
"खंडहर बचे हुए हैं,इमारत नहीं रही;अच्छा हुआ कि सर पर कोई छत नहीं रही
हिम्मत से सच कहो तो,बुरा मानते हैं लोग;रो-रो कर बात कहने की आदत नहीं रही "
anshumanmathur2@gmail.com
Nice Analysis of Society,done a great job........................ Keep it up
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