"भीड़ के इन जंगलों में आदमी हैरान है,न जाने किस गुफा में खो गई पहचान है। जिंदगी का दर्द जीने के लिए दम चाहिए,लाश कँधे पर उठाना बहुत आसान है।" उक्त पंक्तियों के अर्थ पर यदि हम दृष्टि डालें तो इससे केवल एक ही अर्थ निकलता है- दूसरों के प्रति दिखाई जाने वाली सहानुभूति, प्रेम व दया । आज के इस परिवर्तनशील युग में सभी अपने-2 स्वार्थ में डूबे हुए हैं, दूसरों के दुःख दर्द की किसी को कोई चिंता नहीं है । अगर सड़क पर कोई दुर्घटना हो जाए, तो लोग चलते रहते हैं उस पीड़ित को अस्पताल पहुँचाने तक की किसी को फ़ुर्सत नहीं है । आज सरकार और जनता के बीच भी यही स्थिति है, जनता अपनी माँगों के लिए रोती रहती है और सरकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ता । राजनैतिक दुर्दशा व जन आक्रोश के कारण सर्वत्र त्राहि-2 मची हुई है । कहाँ गया वो सम्मान ? कहाँ गई सोने की चिड़िया की गरिमा ? ऐसा क्या है, जो हमारे देश को खोखला किए जा रहा है ? स्वतंत्रता के इन 63 वर्षों में यदि हम देखें तो लगभग सभी परिस्थितियों में एक ही उत्तर मिलता है- आँदोलन...जनता का आँदोलन । आँदोलन तो आज़ाद...